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वैवाहिक ज़िम्मेदारी

डब्बे को खूबसूरती से लपेट सुंदर गोटे से सजा धजा धागे का एक सिरा तुम्हारे हाथ भी उनलोगों ने सौंपा था ना ? तुम बैठ गए एक अकेली कुर्सी पर गर्दन झुका , हैरान परेशान डब्बे का वज़न, बनावट और सजावट आंकने - कहा था करने को किसी ने ऐसा? एक सिरा तुम्हारे हाथ में… Continue reading वैवाहिक ज़िम्मेदारी

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ना-भिलाषा

ना जाने क्यूं इस बार धरती दिवस का शोर थोड़ा जोर का सुनाई दिया । शायद इसलिए क्यूंकि मानव जाति शीश महल में कैद् होने को विवश है , इसलिए धरती कि पुकार ज्यादा आसानी से सुनाई दे रही है । या फिर इसलिए क्यूंकि मानवता अभी भी शर्मसार कर देने वाली घटनाओं से कलंकित… Continue reading ना-भिलाषा